संस्कृति और साहित्य

छत्तीसगढ़ की संस्कृति सम्पूर्ण भारत में अपना बहुत ही ख़ास महत्त्व रखती है।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति

भारत के हृदय-स्थल पर स्थित छत्तीसगढ़, जो भगवान श्रीराम की कर्मभूमि रही है, प्राचीन कला, सभ्यता, संस्कृति, इतिहास और पुरातत्त्व की दृष्टि से अत्यंत संपन्न है। यहाँ ऐसे भी प्रमाण मिले हैं, जिससे यह प्रतीत होता है कि अयोध्या के राजा श्रीराम की माताकौशल्या छत्तीसगढ़ की ही थी। छत्तीसगढ़ की संस्कृति के अंतर्गत अंचल के प्रसिद्ध उत्सव, नृत्य, संगीत, मेला-मड़ई तथा लोक शिल्प आदि शामिल हैं। छत्तीसगढ़ संस्कृति का विकास अरण्यों-तपोवनों में हुआ है। इसलिये यह ऋषि भूमि है। स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने यहां की संस्कृति को नए आयाम दिये।

आज द्विज तथा अद्विज जातियों का धर्म एक ही है संस्कार एक है, भाव तथा विचार एक है, तथा जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण भी एक है। उनका मिश्रण इतनी सघनता से हुआ कि उनके बिलगाव का प्रयत्न कठिन है। अद्विज जातियों ने राजीव लोचन, शिवरीनारायण, सिरपुर, आरंग, खरौद, पाली के भव्य मंदिरों का निर्माण किया।

शैव तथा शाक्त धर्म एवं भक्तिवाद का भी अद्विजों ने विकास किया, जिनमें कबीरपंथ और सतनामी पंथ प्रमुख है। यहां के निर्मल मन जल-छल कपट से दूर हैं। वे परिश्रमी उदारमना और संतोषी स्वभाव के हैं। आदिम जातियों की धर्म-शक्ति उपासना के समीप है। मंत्र शक्ति पर उनका विश्वास है। छत्तीसगढ़ के लोग धर्म के प्रति अडिग एवं अखंडनीय श्रद्धा के अपूरित हैं तो दूसरे धर्मों का समादर करने में उदार हैं।

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